बैसाखी- पंजाब का उत्साह भरा पर्व

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अप्रैल का महीना आते ही पंजाब की हवा में एक जादू सा छा जाता है, ये है बैसाखी के त्यौहार का जादू।

वर्ष 1699 में बैसाखी के दिन, 10 वें सिख गुरु, गुरु गोबिंद सिंह ने खालसा पंथ का गठन किया था। इस दिन को सिख नव वर्ष के रूप में मनाते हैं।

यह दिन पूरे पंजाब में, विशेष रूप से अमृतसर में, भव्य तरीके से मनाया जाता है।

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सुबह से ही भक्त विशेष प्रार्थना के लिए स्वर्ण मंदिर में इकट्ठा होने लगते हैं। हर कोई आने वाले वर्ष में खुशी और समृद्धि के लिए प्रार्थना करता है और चारों ओर वातावरण बहुत निर्मल हो जाता है।

प्रार्थना के बाद, सभी लोग लंगर हॉल की ओर जाते हैं और मतभेदों को दूर रखते हुए एक साथ भोजन करते हैं।

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अगर आप बैसाखी के दिन स्वर्ण मंदिर जा रहे हैं, तो आपको गुरुद्वारे में लंगर के लिए ज़रूर बैठना चाहिए।

इस दिन पूरे पंजाब के साथ-साथ भारत के प्रमुख शहरों में प्रभात-फेरी के रूप में एक विशेष जुलूस भी निकाला जाता है जिसमें पवित्र गुरु ग्रंथ साहिब का प्रदर्शन किया जाता है।

इस अवसर को लोग उत्साहपूर्ण संगीत और नृत्य के साथ भी मनाते हैं।

पंजाब के गाँवों की बात करें तो बैसाखी के दिन जश्न की एक और खास वजह है- इस दिन किसान अपनी फसल की अच्छी पैदावार के लिए उत्साहित होते हैं।

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कई मेले आयोजित किये जाते हैं जहाँ वातावरण भांगड़ा और गिद्दा नृत्य प्रदर्शन से मंत्रमुग्ध हो जाता है। कुश्ती मुकाबलों और अन्य मस्ती भरी प्रतियोगिताओं का भी आयोजन किया जाता है।

यात्रियों को कम से कम एक बार अपने जीवन में बैसाखी के अवसर पर, संस्कृति का अनुभव करने के लिए, पंजाब ज़रूर जाना चाहिए।