जगन्नाथ पुरी रथ यात्रा के रोचक तथ्य

Image courtesy: ©Abhishek Hajela

पुरी में भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा भारत के पूर्वी तट का सबसे रंगीन त्यौहार है। इस वार्षिक उत्सव का हिस्सा बनने के लिए देश के विभिन्न शहरों से लोग पुरी आते हैं।

यह एक ऐसा समय है जब देवताओं को भक्तों के सामने लाया जाता है।

इस रथ यात्रा में भगवान जगन्नाथ (कृष्ण), बलभद्र (बलराम) और बहन सुभद्रा की प्रतिमाओं वाले विशाल रथों को जगन्नाथ मंदिर से गुंडिचा मंदिर- उनके अवकाश गृह- तक ले जाया जाता है।

मूर्तियों के लिए बनाये गए 45 फीट ऊंचे लकड़ी के रथ के निर्माण में दो महीने से अधिक का समय लगता है।

ये विशाल और आकर्षक संरचनाएं जगन्नाथ मंदिर से मुख्य मार्ग पर, अनेक लोगों की भीड़ से गुज़रते हुए, श्री गुंडिचा मंदिर तक ३ किलोमीटर लम्बा रास्ता तय करती हैं।

करीब से देखने पर आपको ‘चेरा पहरा’ की रीति दिखाई देगी जहाँ एक राजा, भगवान की मूर्तियों के समक्ष सोने के हैंडल वाले झाड़ू से सफाई करता है। यह दृश्य ईश्वर के सामने निरपेक्षता व विनम्रता का प्रतीक है। वहीं दूसरी ओर इस दिन एक प्रथा ऐसी भी होती है जहाँ भक्तों को देवताओं को लात मारने, थप्पड़ मारने या अपमानजनक टिप्पणी करने की अनुमति है।

यदि आप यात्रा के पहले दिन पुरी में होते हैं तो इस ३ किलोमीटर लम्बे मार्ग पर अपने लिए एक सुविधाजनक स्थान चुनने के लिए सुबह जल्दी आना बेहतर होगा।

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चूंकि पहले दिन भारी भीड़ होती है, आप दर्शन के लिए अंतिम दिन तक इंतजार कर सकते हैं, जब देवताओं को मौसी मां मंदिर में वापस ले जाया जाता है। फिर भी, फोटोग्राफरों, भक्तों और अन्य यात्रियों के बीच ही दर्शन होंगे।

यदि आप शहर में जल्दी पहुंच रहे हैं, तो त्यौहार से कम से कम 15 दिन पहले जगन्नाथ मंदिर में प्रवेश पाने की उम्मीद न करें। ज़ाहिर है, भगवान को दर्शन देने के लिए अच्छी तरह से विश्राम दिया जाना चाहिए और यात्रा से एक पखवाड़े पहले सभी दर्शन बंद कर दिए जाते हैं।